रिपोर्टर गौरव गुप्ता
लालकुआं। तराई पूर्वी वन प्रभाग की डौली रेंज में सागौन और खैर की तस्करी के लगातार सामने आ रहे मामलों ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीते 15 दिनों के भीतर दो मामलों में विभाग ने अवैध लकड़ी और तस्करी में प्रयुक्त वाहन तो जब्त किए, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी मुख्य आरोपी फरार होने में सफल रहे।
तिलियापुर और डौली रेंज में हुई इन कार्रवाइयों के दौरान भारी मात्रा में अवैध लकड़ी बरामद की गई। इसके बावजूद तस्करों का बार-बार चकमा देकर भाग निकलना यह दर्शाता है कि कार्रवाई सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि तंत्र की कमजोरी या लापरवाही तस्करों के हौसले बुलंद कर रही है।
तस्कर अब अपने तौर-तरीके भी बदल चुके हैं। सागौन और खैर की लकड़ी को छोटे-छोटे गट्ठरों में काटकर सेंट्रो, पिकअप और स्कॉर्पियो जैसे वाहनों में छिपाकर ले जाया जा रहा है, जिससे उन्हें पकड़ना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।
वन विभाग और एसओजी की टीम द्वारा लगातार छापेमारी के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हर बार तस्करों का फरार हो जाना इन दावों की सच्चाई पर सवाल खड़े करता है। कुछ मामलों में तो हिरासत से ही आरोपियों के भागने की घटनाएं सामने आई हैं, जो सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करती हैं।
स्थानीय निवासियों और वन माफियाओं के बीच संभावित मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है। सख्ती के बावजूद अवैध कटान और तस्करी पर पूरी तरह लगाम नहीं लग पा रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के दावे भी खोखले साबित हो रहे हैं।
लगातार मामलों के बावजूद आरोपी अब तक गिरफ्त से बाहर हैं, जो तंत्र की निष्क्रियता को साफ दर्शाता है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है, लेकिन जिम्मेदार विभाग ठोस नतीजे देने में नाकाम नजर आ रहा है।
फिलहाल विभाग का कहना है कि फरार तस्करों की तलाश जारी है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई कभी अंजाम तक पहुंचेगी या हर बार की तरह केवल जब्ती तक ही सीमित रह जाएगी। अब जरूरत है कि तंत्र कुंभकर्णी नींद से जागे और वन माफियाओं पर सख्त शिकंजा कसकर जंगलों को बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।