रिपोर्टरगौरवगुप्ता।

लालकुआं/हल्द्वानी !

तराई पूर्वी वन प्रभाग में सामने आ रहे तस्करी के अधिकांश मामलों में एक समान पैटर्न देखने को मिल रहा है—मौके से वाहन बरामद, लेकिन चालक हर बार फरार। डोली रेंज का ताजा मामला भी इसी कड़ी का हिस्सा बनता नजर आ रहा है, जिससे वन विभाग की कार्रवाई की गंभीरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि जब वाहन बरामद हो जाता है, तो उसके स्वामी की पहचान करना कोई मुश्किल काम नहीं होता। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि चालक फरार हो जाता है, तो क्या वाहन स्वामी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती? जानकारों की मानें तो कानून में स्पष्ट प्रावधान हैं, जिनके तहत वाहन स्वामी की जिम्मेदारी तय की जा सकती है, खासकर जब वाहन अवैध गतिविधियों में प्रयुक्त पाया जाए।

यही वह बिंदु है जहां वन विभाग की कार्यशैली कटघरे में खड़ी नजर आती है। तीन दिन बीत जाने के बाद भी “दबिश दी जा रही है” जैसे बयान ही सामने आ रहे हैं, लेकिन ठोस कार्रवाई या गिरफ्तारी की कोई खबर नहीं है। सवाल उठता है कि जब वाहन स्वामी तक पहुंच संभव है, तो फिर कार्रवाई में देरी क्यों?

इससे पहले भी कई मामलों में यही देखा गया कि शुरुआती कार्रवाई के बाद मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया। न तो आरोपियों तक पहुंच बन पाई और न ही तस्करी के नेटवर्क का खुलासा हो सका। अब डोली रेंज का मामला भी उसी दिशा में बढ़ता दिख रहा है।

वन विभाग के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह केवल औपचारिक कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि जवाबदेही तय करते हुए सख्त कदम उठाए। यदि वाहन स्वामी की भूमिका संदिग्ध है, तो उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि तस्करी के नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या वन विभाग सिर्फ “बरामदगी” दिखाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है?

या फिर इस बार वाकई जिम्मेदारों तक पहुंचकर कोई ठोस उदाहरण पेश किया जाएगा?

डोली रेंज का यह मामला अब सिर्फ एक तस्करी की घटना नहीं, बल्कि वन विभाग की कार्यप्रणाली की परीक्षा बन चुका है। अब देखना होगा कि महकमा सवालों के घेरे से बाहर निकल पाता है या फिर एक और मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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